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आपकी उमà¥à¤° का खाने पर कà¥à¤¯à¤¾ होता है असर
आप जीने के लिठखाते हैं या खाने के लिठजीते हैं? ये सवाल इसलिठकà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि बहà¥à¤¤ से लोग शान से कहते हैं कि वो तो बस खाने के लिठज़िंदा हैं.
खाने से हमारा रिशà¥à¤¤à¤¾ बड़ा पेचीदा है. इस रिशà¥à¤¤à¥‡ पर खाने की चीज़ों की क़ीमत, उनकी उपलबà¥à¤§à¤¤à¤¾ और आस-पास के लोगों के खाने के सà¥à¤µà¤à¤¾à¤µ का असर पड़ता है.
हर इंसान बाक़ी लोगों से à¤à¤• चीज़ साà¤à¤¾ करता है और वो है कà¥à¤› खाने की हमारी ख़à¥à¤µà¤¾à¤¹à¤¿à¤¶.
à¤à¥‚ख के ज़रिठहमारा शरीर हमें बताता है कि कब उसे ईंधन यानी खाने की ज़रूरत है. लेकिन, हमारी खाने की ख़à¥à¤µà¤¾à¤¹à¤¿à¤¶ सिरà¥à¤«à¤¼ à¤à¥‚ख से नहीं जà¥à¤¡à¤¼à¥€ होती. इसका वासà¥à¤¤à¤¾ कई बातों से है. कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि कई बार हम à¤à¥‚ख न होने पर à¤à¥€ खाते हैं. और, कई बार à¤à¥‚ख लगी होने पर à¤à¥€ खाना नहीं खाते.
हालिया रिसरà¥à¤š ने बताया है कि खाने से जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ कई संकेत हमारी खाने की इचà¥à¤›à¤¾ पर असर डालते हैं. जैसे ख़à¥à¤¶à¤¬à¥‚, खाना बनने की आवाज़ और विजà¥à¤žà¤¾à¤ªà¤¨. कà¥à¤² मिलाकर, हमारे इरà¥à¤¦-गिरà¥à¤¦ à¤à¤¸à¤¾ इंदà¥à¤°à¤œà¤¾à¤² बन जाता है, जिसमें फंसकर हम ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ खा लेते हैं.
हमारी खाने की इचà¥à¤›à¤¾ à¤à¥€ हमेशा à¤à¤• जैसी नहीं होती. ज़िंदगी के अलग-अलग दौर में ये अलग-अलग होती है. उमà¥à¤° के साथ खाने की ख़à¥à¤µà¤¾à¤¹à¤¿à¤¶ में बदलाव आता है.
खाने की बात करें तो किसी आम इंसान की ज़िंदगी में इस उतार-चढ़ाव के सात चरण आते हैं. इनके बारे में अपनी समठबढ़ाकर हम कम खाने या ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ खाने की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¥€ से निपट सकते हैं. खाने की आदतों के हमारी सेहत पर पड़ने वाले मोटापे जैसे असर पर नियंतà¥à¤°à¤£ कर सकते हैं.
खाना, जंक फूड, मोटापा
उमà¥à¤° का पहला दौर (0-10 साल)
इस दौर में बचà¥à¤šà¥‡ बहà¥à¤¤ तेज़ी से बढ़ रहे होते हैं. इस वक़à¥à¤¤ जो खान-पान वो करते हैं, वो उनके बड़े होने तक असर डालता है. कोई बचपन में मोटा होता है तो वो बड़ा होकर à¤à¥€ मोटा रह सकता है.
बचà¥à¤šà¥‡ अकà¥à¤¸à¤° कà¥à¤› चीज़ों को खाने से डरते हैं. आनाकानी करते हैं. लेकिन बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को बार-बार à¤à¤¸à¥€ चीज़ें चखाकर, उनकी ख़ूबियों के बारे में बताकर हम बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को सेहतमंद चीज़ें, जैसे सबà¥à¤œà¤¼à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ खाने की आदत डाल सकते हैं.
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को हमें खाते वक़à¥à¤¤ ख़à¥à¤¦ पर क़ाबू रखना à¤à¥€ सिखाना चाहिà¤. ख़ास तौर से उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ ये बताना चाहिठकि वो कितना खाà¤à¤‚. इतना ठूंस कर न खा लें कि मोटापे की तरफ़ बढ़ चलें.
कई बार मां-बाप बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को पà¥à¤²à¥‡à¤Ÿ 'साफ़' करने यानी पà¥à¤²à¥‡à¤Ÿ में मौजूद पूरा खाना ख़तà¥à¤® करने पर मजबूर करते हैं. इससे होता ये है कि बचà¥à¤šà¥‡ बेमन से पूरा खाना ठूंस लेते हैं. बाद के दिनों में ये उनमें ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ खाने की आदत डाल सकता है.
इन दिनों कई देशों में बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को जंक फूड के विजà¥à¤žà¤¾à¤ªà¤¨à¥‹à¤‚ से बचाने की मà¥à¤¹à¤¿à¤® चल रही है. ये विजà¥à¤žà¤¾à¤ªà¤¨ सिरà¥à¤«à¤¼ टीवी या रेडियो पर नहीं आते, बलà¥à¤•ि à¤à¤ª, होरà¥à¤¡à¤¿à¤‚ग, सोशल मीडिया और वीडियो बà¥à¤²à¥‰à¤—िंग से à¤à¥€ बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को उकसाते हैं.
सतà¥à¤¤à¤¾ को चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¥€ देने से पीछे कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ हट जाते हैं हम
कहां रहना सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ के लिठफ़ायदेमंद है, गांव या शहर?
मछली या सी-फ़ूड खाने से पहले ज़रा रà¥à¤•िà¤
खान-पान के विजà¥à¤žà¤¾à¤ªà¤¨ से खाने की डिमांड बढ़ जाती है. बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ में बढ़ते मोटापे के लिठये à¤à¤• बड़ी वजह मानी जा रही है.
खाना, जंक फूड, मोटापा
उमà¥à¤° का दूसरा पड़ाव (10-20 साल)
किशोरावसà¥à¤¥à¤¾ में शरीर तेज़ी से बढ़ता है. हारमोनà¥à¤¸ का रिसाव मूड और बरà¥à¤¤à¤¾à¤µ को कंटà¥à¤°à¥‹à¤² करता है. इस दौरान कोई इंसान खाने को लेकर कैसा बरà¥à¤¤à¤¾à¤µ करता है, वो बाद की ज़िंदगी के लिठबेहद अहम होता है.
किशोर अवसà¥à¤¥à¤¾ में खान-पान को लेकर किठजाने वाले फ़ैसले, आने वाली पीढ़ी तक पर असर डालते हैं. यानी जो शख़à¥à¤¸ उमà¥à¤° के इस दौर में जैसा खान-पान करता है, उसका असर सिरà¥à¤«à¤¼ उसी इंसान पर नहीं, बलà¥à¤•ि उसकी आने वाली पीढ़ी तक पर पड़ता है.
बदक़िसà¥à¤®à¤¤à¥€ से इस दौर में सलाह-मशविरे की कमी की वजह से किशोरवय लोग à¤à¤¸à¥‡ खाने-पीने की आदतें डाल लेते हैं, जो उनकी सेहत के लिठबà¥à¤°à¤¾ होता है.
फिर लड़कों के मà¥à¤•़ाबले लड़कियों पर इन बà¥à¤°à¥€ आदतों का ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ असर पड़ता है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि इस उमà¥à¤° में उनके शरीर में पà¥à¤°à¤œà¤¨à¤¨ की पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ यानी मासिक धरà¥à¤® की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ à¤à¥€ हो जाती है.
गà¥à¤«à¤¾ से निकाले गठबचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को हो सकती है यह बीमारी
कà¥à¤¯à¤¾ हम बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤‚ड में अकेले हैं? 'शायद हां'
कम उमà¥à¤° में गरà¥à¤à¤µà¤¤à¥€ होने वाली लड़कियों के लिठये चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¥€ और à¤à¥€ बढ़ जाती है. कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि उनका शरीर अपने विकास के लिठपेट में पल रहे बचà¥à¤šà¥‡ के साथ मà¥à¤•़ाबिल होता है.
खाना, जंक फूड, मोटापा
तीसरा दशक (20-30 साल)
यà¥à¤µà¤¾à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ में ज़िंदगी में कई बदलाव आते हैं. लोग कॉलेज जाना शà¥à¤°à¥‚ करते हैं. शादी करते हैं या किसी के साथ रहना शà¥à¤°à¥‚ करते हैं. इस दौर में कई लोग मां-बाप à¤à¥€ बनते हैं. इन सà¤à¥€ वजहों से वज़न बढ़ने का अंदेशा होता है.
शरीर में जब à¤à¤• बार फैट जमा हो जाता है, तो उससे पीछा छà¥à¤¡à¤¼à¤¾à¤¨à¤¾ बहà¥à¤¤ मà¥à¤¶à¥à¤•िल होता है. जब हम अपने शरीर की ज़रूरतों से कम खाते हैं, तो हमारा शरीर बहà¥à¤¤ तेज़ इशारे देता है.
लेकिन, जब हम शरीर की ज़रूरत से ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ खाते हैं, तो इसे रोकने वाले सिगà¥à¤¨à¤² बहà¥à¤¤ कमज़ोर होते हैं. बहà¥à¤¤ से शारीरिक और मानसिक कारण होते हैं, जिनकी वजह से हम कम खाने की आदत को लंबे वक़à¥à¤¤ तक बरक़रार नहीं रख पाते हैं.
हाल के दिनों में à¤à¤• नठतरह की रिसरà¥à¤š शà¥à¤°à¥‚ हà¥à¤ˆ है. इसके तहत लोगों को कम खाकर तसलà¥à¤²à¥€ होने का à¤à¤¹à¤¸à¤¾à¤¸ कराने के तरीक़े विकसित किठजा रहे हैं.
जो लोग वज़न घटाने की कोशिश कर रहे होते हैं, उनके लिठये रिसरà¥à¤š कारगर हो सकती है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि à¤à¥‚ख महसूस करने की वजह से ही हम कई बार शरीर की ज़रूरत से ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ खा लेते हैं.
अलग-अलग तरह की खाने की चीज़ें हमारे दिमाग़ को अलग-अलग संकेत देती हैं. यही वजह है कि ढेर सारी आइसकà¥à¤°à¥€à¤® खाते जाने के बावजूद दिमाग़ हमें रोकने के इशारे नहीं देता. कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि फैट हमारे दिमाग़ को वो संकेत नहीं देता कि हम खाना रोकें.
यही वजह है कि समोसे, चाट-पकौड़ी या कचौरियां खाते वक़à¥à¤¤ अंदाज़ा ही नहीं होता कि कितना खाठजा रहे हैं हम!
वहीं पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥€à¤¨ से à¤à¤°à¤ªà¥‚र डाइट हो या ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ पानी वाले फल, इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ खाने से हमें जलà¥à¤¦à¥€ पेट à¤à¤°à¤¨à¥‡ का अहसास होता है, और लंबे वक़à¥à¤¤ तक à¤à¤¸à¤¾ महसूस होता रहता है.
खान-पान के कारोबार की समठबेहतर करके हम à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ में à¤à¤¸à¤¾ खाना या नाशà¥à¤¤à¤¾ तैयार कर सकते हैं, जो सेहत के लिठज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ अचà¥à¤›à¤¾ हो.
खाना, जंक फूड, मोटापा
उमà¥à¤° का चौथा दशक (30-40 साल)
कामकाजी उमà¥à¤° में पेट के शोर के अलावा à¤à¥€ कई और चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ हमारे सामने आती हैं. तनाव बढ़ जाता है. और तनाव की वजह से 80 फ़ीसद आबादी के खान-पान की आदतों पर असर पड़ता है. कà¥à¤› लोग तनाव में ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ खाने लगते हैं, तो, कà¥à¤› खाना ही छोड़ देते हैं.
तनाव से निपटने के ये तरीक़े कई बार समठसे परे होते हैं. किसी को खान-पान की लत पड़ जाती है. वो ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ कैलोरी वाली चीज़ें खाने लगते हैं. लेकिन, इसकी ठोस वजह समठमें नहीं आ सकी है.
काम के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ ईमानदारी और हर काम को सलीक़े से करने की आदत का à¤à¥€ हमारे खान-पान और तनाव से गहरा नाता है.
'पूत के पांव पालने में दिखते हैं', कà¥à¤¯à¤¾ ये सच है?
मà¥à¤¸à¥à¤•à¥à¤°à¤¾ नहीं सकते, तो आप नà¥à¤•़सान में रहेंगे
काम का माहौल à¤à¤¸à¤¾ बनाना जिसमें तनाव कम हो, लोग ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ कैलोरी वाली चीज़ें न खाà¤à¤‚, बहà¥à¤¤ मà¥à¤¶à¥à¤•िल है. कंपनियों को चाहिठकि वो करà¥à¤®à¤šà¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के लिठà¤à¤¸à¤¾ ससà¥à¤¤à¤¾ खाना मà¥à¤¹à¥ˆà¤¯à¤¾ कराà¤à¤‚, जो सेहत के लिठअचà¥à¤›à¤¾ हो. इससे कामगार सेहतमंद होंगे. और सेहतमंद करà¥à¤®à¤šà¤¾à¤°à¥€ बेहतर काम करेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं.
खाना, जंक फूड, मोटापा
उमà¥à¤° का पांचवां दशक (40-50 साल)
डाइट शबà¥à¤¦ गà¥à¤°à¥€à¤• ज़बान के डायेटिया से आया है. इसका मतलब है, 'ज़िंदगी जीने का तरीक़ा, या जीवन-शैली'. लेकिन हम सब आदतों के गà¥à¤²à¤¾à¤® होते हैं. हम अकà¥à¤¸à¤° अपनी आदतों में वो बदलाव नहीं ला पाते हैं, जिनके बारे में हमें पता होता है कि ये हमारे ही फ़ायदे की चीज़ होगी.
लोग वज़न तो घटाना चाहते हैं, मगर समोसे-कचौरी और à¤à¤¸à¥€ ही तली-à¤à¥à¤¨à¥€, ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ कैलोरी वाली चीज़ें खाते हà¥à¤.
अब à¤à¤²à¤¾ ये कैसे मà¥à¤®à¤•िन है?
बिना खान-पान की आदतों में बदलाव लाठहम सेहतमंद शरीर और सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ ज़हन कैसे पा सकते हैं?
इस बात के तमाम सबूत हैं जो बताते हैं कि खान-पान का अचà¥à¤›à¥€ या ख़राब सेहत से गहरा तालà¥à¤²à¥à¤•़ है.
विशà¥à¤µ सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ संगठन कहता है कि धूमà¥à¤°à¤ªà¤¾à¤¨, सेहत के लिठबà¥à¤°à¥€ चीज़ें खाने, वरà¥à¤œà¤¼à¤¿à¤¶ न करने और शराब पीने की आदतें, हमारी जीवन शैली के सेहत पर बà¥à¤°à¥‡ असर की बड़ी वजहें हैं. इससे लोगों के मरने की दर à¤à¥€ बढ़ जाती है.
40-50 साल की उमà¥à¤° के दौर में लोगों को अपनी सेहत के हिसाब से ही खाना चाहिà¤. लेकिन, बहà¥à¤¤ से लोग सेहत के ख़राब होने के संकेत, जैसे बà¥à¤²à¤¡ पà¥à¤°à¥‡à¤¶à¤° या कोलेसà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥‰à¤² बढ़ने की अनदेखी कर देते हैं और सही समय पर उचित क़दम नहीं उठाते. इसकी à¤à¤¾à¤°à¥€ क़ीमत चà¥à¤•ानी पड़ती है.
खाना, जंक फूड, मोटापा
साठका दशक (50-60 साल)
50 साल की उमà¥à¤° पार करने के बाद किसी à¤à¥€ इंसान के शरीर की मांसपेशियां घटने लगती हैं.
इसमें सालाना आधा से à¤à¤• फ़ीसद की दर से गिरावट आने लगती है. शरीर की सकà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤¾ और चपलता कम हो जाती है. पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥€à¤¨ कम खाने और महिलाओं में मीनोपॉज़ होने से पेशियां तेज़ी से कम होने लगती है.
इस दौर में सेहतमंद और तमाम तरह के डाइट आज़माने से उमà¥à¤° ढलने का असर कम होता है. उमà¥à¤°à¤¦à¤°à¤¾à¤œà¤¼ होती आबादी को इस दौर में ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥€à¤¨ वाली डाइट की ज़रूरत होती है, जो अकà¥à¤¸à¤° पूरी नहीं होती.
अà¤à¥€ बाज़ार में जो पà¥à¤°à¥‹à¤Ÿà¥€à¤¨ वाली खाने-पीने की चीज़ें मिल रही हैं, वो हमारी ज़रूरतों को नहीं पूरा कर सकतीं.
खाना, जंक फूड, मोटापा
सातवां दशक (60-70 साल और उसके आगे)
आज लोगों की औसत उमà¥à¤° बढ़ गई है. à¤à¤¸à¥‡ में हमें रहन-सहन को सेहतमंद बनाने की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¥€ से ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ जूà¤à¤¨à¤¾ पड़ रहा है. अगर हम सà¥à¤µà¤¸à¥à¤¥ जीवन-शैली नहीं अपनाते हैं, तो हमारा समाज बà¥à¤œà¤¼à¥à¤°à¥à¤—, कमज़ोर और विकलांग लोगों से à¤à¤° जाà¤à¤—ा.
बà¥à¤¢à¤¼à¤¾à¤ªà¥‡ में पोषण की अहमियत बढ़ जाती है. वजह साफ़ है. इस उमà¥à¤° में à¤à¥‚ख कम लगती है. लोग कम खाते हैं. खाने में दिलचसà¥à¤ªà¥€ नहीं लेते. इससे शरीर का वज़न घट जाता है. कमज़ोरी आ जाती है. इससे à¤à¥‚लने वाली बीमारी यानी अलà¥à¤œà¤¼à¤¾à¤‡à¤®à¤° होने का ख़तरा बढ़ जाता है.
खाना à¤à¤• सामाजिक अनà¥à¤à¤µ है. बà¥à¤¢à¤¼à¤¾à¤ªà¥‡ में जीवनसाथी के चले जाने या परिवार से बिछà¥à¤¡à¤¼à¤¨à¥‡ के बाद अकेले खाना लोगों से खाने से हासिल होने वाली तसलà¥à¤²à¥€ और ख़à¥à¤¶à¥€ छीन लेता है. फिर चबाने और निगलने में à¤à¥€ बà¥à¤¢à¤¼à¤¾à¤ªà¥‡ में दिक़à¥à¤•़त होती है.
इससे खाने का सà¥à¤µà¤¾à¤¦ और ख़à¥à¤¶à¤¬à¥‚ नहीं महसूस होती. नतीजा ये कि खाने की ख़à¥à¤µà¤¾à¤¹à¤¿à¤¶ और à¤à¥€ कम हो जाती है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि लोग उससे मिलने वाली ख़à¥à¤¶à¥€ से महरूम हो जाते हैं.
हमें याद रखना चाहिठकि ज़िंदगी के हर दौर में खाना केवल हमारे शरीर का ईंधन à¤à¤° नहीं है. ये à¤à¤¸à¤¾ सामाजिक-सांसà¥à¤•ृतिक तजà¥à¤°à¥à¤¬à¤¾ है, जिसका लà¥à¤¤à¥à¤«à¤¼ उठाया जाता है.
हम सब खाने के à¤à¤•à¥à¤¸à¤ªà¤°à¥à¤Ÿ हैं, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि हम रोज़ खाते हैं.
इसलिठहमें हर बार खाने को लà¥à¤¤à¥à¤«à¤¼ लेने के मौक़े के तौर पर देखना चाहिà¤. और ये समà¤à¤¨à¤¾ चाहिठकि अचà¥à¤›à¤¾ और सà¥à¤µà¤¾à¤¦à¤¿à¤·à¥à¤Ÿ खाना हमारी सेहत के लिठकितनी नेमतें ले आता है.
(नोटः ये à¤à¤²à¥‡à¤•à¥à¤¸ जॉनà¥à¤¸à¥à¤Ÿà¤¨ की मूल सà¥à¤Ÿà¥‹à¤°à¥€ का अकà¥à¤·à¤°à¤¶: अनà¥à¤µà¤¾à¤¦ नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिठइसमें कà¥à¤› संदरà¥à¤ और पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग जोड़े गठहैं)
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